सिर्फ Birthday और 'Dry Day' ही नहीं - स्वच्छता भी याद रखो! | KhabarForYou
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- 02 Oct, 2026
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2 अक्टूबर आते ही दो चीज़ें हर किसी के दिमाग में सबसे पहले तैरती हैं: एक सरकारी छुट्टी (यानी गांधी जयंती) और दूसरा शराब की दुकानों पर लटका ताला, यानी 'Dry Day'। शाम की पार्टी का इंतज़ाम लोग 1 अक्टूबर की दोपहर से ही कर लेते हैं। लेकिन जिस मक़सद के लिए इस दिन को राष्ट्रीय संकल्प बनाया गया था, वह कैलेंडर के पन्नों और सोशल मीडिया की तस्वीरों के बीच कहीं गुम हो चुका है।
सीधी बात यह है कि 2 अक्टूबर 2014 को जब देश के प्रधानमंत्री ने हाथ में झाड़ू थामी थी, तब लगा था कि देश की सड़कें, गलियां और नालियां अब वाकई बदलेंगी। 12 साल बीत जाने के बाद, अनगिनत सेस (Cess) चुकाने के बाद और हज़ारों विज्ञापनों के बावजूद आज हकीकत क्या है? हकीकत यह है कि हमारे शहर आज भी बदबूदार नालों, सड़े हुए कचरे और ओवरफ्लो होते डंपिंग यार्ड्स के ढेर पर सांस ले रहे हैं।
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2014 का वो दिन: जब लगा था कि सच में तस्वीर बदलेगी
साल 2014 में जब 'स्वच्छ भारत मिशन' लॉन्च हुआ, तो माहौल में एक उम्मीद थी। लक्ष्य तय हुआ कि 2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक देश को खुले में शौच से मुक्त (Open Defecation Free) करना है और शहरों का कायाकल्प करना है।
शुरुआती दौर में असर भी दिखा:
- करोड़ों की संख्या में ग्रामीण और शहरी इलाकों में शौचालय बने।
- हर सुबह 'गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल' की धुन हमारे कानों में बजने लगी।
- स्वच्छ सर्वेक्षण के नाम पर शहरों में रैंकिंग की होड़ मची।
- 'स्वच्छता ही सेवा' जैसे पखवाड़े शुरू हुए, मैराथन और प्लॉग रन आयोजित हुए।
लेकिन 12 साल बाद सवाल यह है कि क्या यह मिशन स्थायी आदत बन पाया या सिर्फ 2 अक्टूबर को मनाए जाने वाला एक सालाना 'इवेंट' बनकर रह गया?
VIP झाड़ू और एक दिन का फोटो-ऑप: ज़मीनी तमाशा
2 अक्टूबर की सुबह अखबारों और टीवी पर एक जैसी तस्वीरें छपती हैं - सफेद कुर्ते-पायजामे में नेता, अफ़सर और समाजसेवक साफ़-सुथरी सड़क पर पहले से डाले गए चार सूखे पत्तों पर नई-नवेली झाड़ू चलाते दिखते हैं। चार कैमरे फ्लैश चमकते हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट जाती है और दोपहर 12 बजे तक झाड़ू वहीं फेंककर सब अपने एयर-कंडीशन दफ्तरों में लौट जाते हैं।
शाम होते-होते उसी डिवाइडर के पीछे पॉलीथीन, गुटखे की पीक और प्लास्टिक की खाली बोतलें वैसे ही तैरती नज़र आती हैं। यह स्वच्छता अभियान नहीं, महज़ 'इवेंट मैनेजमेंट' है। जब तक सफाई सिर्फ फोटो खिंचवाने का माध्यम रहेगी, तब तक किसी भी शहर की सूरत नहीं बदलने वाली।
हर शहर का एक ही दर्द: बदहाल सिस्टम
अक्सर सारा दोष आम जनता की 'नागरिक समझ' (civic sense) पर मढ़ दिया जाता है। बेशक, हमारी आदतें भी खराब हैं, लेकिन सिस्टम की नाकामी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता:
सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का फेल होना: घर-घर से कचरा कलेक्ट तो हो जाता है, लेकिन उसका वैज्ञानिक निस्तारण (Solid Waste Processing) देश के 80% शहरों में शून्य है। सूखा और गीला कचरा अलग करके दिया भी जाए, तो गाड़ी वाला उसे एक ही कंटेनर में उड़ेल देता है।
शहरों के बाहर कचरे के पहाड़: दिल्ली का गाज़ीपुर हो या किसी टियर-2/टियर-3 शहर का बाईपास - शहर में घुसते ही स्वागत बदबूदार लैंडफिल करते हैं। यह कचरा रीसायकल होने के बजाय सिर्फ डंप किया जा रहा है।
ड्रेनेज और सीवरेज सिस्टम का दम घुटना: हल्की सी बारिश होते ही हर छोटे-बड़े शहर की सड़कें गंदे नाले में तब्दील हो जाती हैं। नालियां प्लास्टिक से चोक हैं और नगर निगम के पास सफाई का कोई ठोस रोडमैप नहीं है सिवाय मॉनसून के बाद टेंडर निकालने के।
सफाई कर्मचारियों की उपेक्षा: साल में एक दिन मंच पर बुलाकर शॉल ओढ़ाने से सफाई कर्मचारियों की ज़िंदगी नहीं सुधरती। आज भी बिना आधुनिक सेफ्टी गियर्स और मशीनरी के उन्हें सीवरों में उतरना पड़ता है।
हमारी आदतें: 'मेरा घर साफ़, बाहर चाहे नरक हो'
सिस्टम भ्रष्ट और सुस्त है, इसमें दो राय नहीं। लेकिन आईना हमें भी देखना पड़ेगा। हमारी मानसिकता यह बन चुकी है कि अपने ड्राइंग रूम से झाड़ू लगाकर कचरा सीधे सड़क या पड़ोसी के खाली प्लॉट में फेंक दो।
कार की खिड़की नीचे करके चिप्स का पैकेट फेंकना, बाइक चलाते हुए थूकना, और चौराहे के कोने को स्थायी डस्टबिन समझ लेना - यह कोई सरकार हमसे नहीं करवाती। यह हमारी अपनी नागरिक लापरवाही है। हम यूरोप और सिंगापुर की सफाई की मिसालें देते नहीं थकते, लेकिन अपने ही शहर की सड़क पर चलते हुए दो कदम चलकर डस्टबिन ढूंढने की ज़हमत नहीं उठाते।
अब भाषण नहीं, कड़े एक्शन की ज़रूरत है
अगर 2 अक्टूबर को सिर्फ एक औपचारिक छुट्टी और 'ड्राई डे' के मज़ाक से आगे ले जाना है, तो कुछ कड़े और व्यावहारिक फैसले लेने होंगे:
1.सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर ज़ीरो टॉलरेंस: छोटे दुकानदारों के चालान काटने के बजाय उन बड़ी फैक्ट्रियों और सप्लाई चेन्स पर ताला लगाना होगा जहां से यह प्लास्टिक बाज़ार में उतरता है।
2. लोकल लेवल पर सख्त जुर्माने: सिंगापुर या इंदौर जैसी सख्ती हर शहर में लानी होगी। सार्वजनिक जगहों पर कचरा फेंकने और थूकने वालों पर सीसीटीवी के ज़रिये सीधे ई-चालान कटने चाहिए।
3. म्युनिसिपल अकाउंटेबिलिटी: अगर किसी वार्ड में कचरा तीन दिन तक नहीं उठता, तो ज़िम्मेदारी सिर्फ सफाईकर्मी की नहीं, इलाके के पार्षद, सेनेटरी इंस्पेक्टर और नगर निगम आयुक्त की तय होनी चाहिए।
4. सच्ची रीसाइक्लिंग यूनिट्स: कचरे को ज़मीन में दबाने के बजाय 'वेस्ट-टू-एनर्जी' और आधुनिक कंपोस्टिंग प्लांट्स को हर ज़िले में अनिवार्य करना होगा।
2 अक्टूबर को महापुरुषों के आगे सिर झुकाना और छुट्टी मनाना बहुत आसान है। मुश्किल है अपनी जेब में पड़े रैपर को तब तक हाथ में रखना जब तक डस्टबिन न मिल जाए। इस 2 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर भाषण देने से पहले अपने घर के बाहर झांकिए - अगर वहां बदबू और गंदगी है, तो समझ लीजिए कि स्वच्छ भारत मिशन अभी बहुत अधूरा है।
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